अजनबी

आपकी सदा में कोई ख़ता न थी,
मेरे दर को दस्तक की आदत न थी
तन्हाई इकलौती दौलत है मेरी
गिनते-गिनते जिसे ये उम्र कटी
अपनों से आस सलीक़े से थी छोड़ी
वो सलीक़ा तोड़ा एक नज़र ने तुम्हारी
जिन दीवारों में ज़िंदगी थी छिपी
तुम्हारी मुस्कुराहट से दरारें पड़ गईं
उम्मीद जो तेरी आँखों में है जमी
उससे डर लगता है, ए अजनबी

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