हाथों की कुछ चंद लकीरें
या सड़क किनारे बैठा तोता
आसमान में ही कोई बादल
या आँगन में खेलता वो झोंका
काश कभी तो कोई
इस लौ को भनक देता
देता आने वाले तूफ़ान की
कोई तो छोटी सी इत्तला
Poems by Rohit Malekar
हाथों की कुछ चंद लकीरें
या सड़क किनारे बैठा तोता
आसमान में ही कोई बादल
या आँगन में खेलता वो झोंका
काश कभी तो कोई
इस लौ को भनक देता
देता आने वाले तूफ़ान की
कोई तो छोटी सी इत्तला
ए दिल ए नादान, तेरी फ़ितरत समझने में अर्सा बीत गया,
मंज़िलों की आपाधापी में, मैं ख़ुद को खोता रह गया।
हर मक़ाम पे तूने, एक नई तलाश का ऐलान कर दिया,
तेरी ख्वाहिशों की दौड़ में, ज़िंदगी का तमाशा बन गया।
अब एक पल जी लेने दे, जिसमें कोई इंतज़ार न हो,
एक क़दम बढ़ा लेने दे, जिसमें कोई मक़सद न हो,
एक धड़कन सुन लेने दे, जिसमें कोई चाह न हो,
एक साँस ले लेने दे, जिसमें कोई जुस्तजू न हो।
“इतना smile करोगे तो
कौन लेगा seriously तुम्हें?”,
“थोड़ा मुस्कुराओगे मेहमानों में
तो पैसे नहीं कटेंगे bank से”,
“गुस्सा तुम क्यों हो रहें हो
बात तो सही हैं ना उनकी?”,
“पैसे ले गया जादा तुमसे वो
गुस्सा कैसे नहीं आ रहाँ तुम्हे?”,
“चिल्लाओं मत उनपे तुम,
भगवान का रूप होते हैं बच्चे”,
“इतने नरमी से पेश आओगे,
तो बच्चे हाथ से निकल जाएंगे”,
“Match ही तो हैं कोई जंग नहीं
इतना emotional क्यों हो रहें हो?”,
“ऐसे आराम से कैसे सो सकते हो
किसी का दर्द कभी समझ पाए हो?”
निकले थे घर से कभी
दुनिया बदलने हम भी
ना जाने कब हुई पराई
हम से ही हमारी परछाई
आईने में देता है दिखाई
रोज़ नया अजनबी कोई
पूछता रहता है एक पता
है नाम बड़ा जाना-पहचाना
ऐसा नहीं है हरगिज़
कि हार मान चुके हैं हम
तू दिखा दे खुदा तेरा दम
बंदा पी लेगा एक और ग़म
फिर आँसुओं की कहीं
आज बरसात होगी
ज़िंदगी हमको हमारी
औक़ात दिखा देगी
शुक्र है कि सिर्फ़ चाहने से
दोबारा जी पाता हूँ उन यादों में,
वरना ना जाने कितनी तस्वीरों में
उलझा देता ये आवारा दिल।
शुक्र है कि सिर्फ़ चाहने से
नहीं बनती किसी की क़िस्मत,
वरना ना जाने कितनी तक़दीरों में
उलझा देता ये आवारा दिल।
ये कोहरा तो पिघल जाएगा,
आफताब की आहट से,
कमबख्त के साथ लिखे,
जो रातभर हमने शिकवे,
दर्द कुछ स्याही में लिपटे,
क्या होंगे कभी वो भी फीके?
अनकहे अल्फाजों की भीड़ में
खिल रहीं ख्वाहिशें
समेटकर मानो पूरी जिंदगी
यूंही एक पल में
इन सांसों की मौजूदगी होगी
तब्दील जब यादों में
कोशिश करेंगे ना होगा गम कोई
आपकी कशिश में
करके मगर तकाजा इजहार का
इस मुलाकात की
ना छीन लो मिल्कियत इकलौती
हमसे हमारी खामोशी
अपने ग़रज़ के लिए नहीं
अपने वजूद के लिए नहीं
अपने सपनों के लिए नहीं
अपने अपनो के लिए नहीं
समेट ले ये पल जरा
बस यूँ ही, बेवजह ज़रा
जैसे एक बादल आवारा
तू उतार दे ये बोझ सारा
ढूंढ ले वो डगर जहाँ
किसी को तेरा इंतजार नहीं
पकड़ वो रास्ता जहाँ
मंज़िल की तुझे दरकार नहीं
तू बुझा दे आज सारे दिये
तू मिटा दे आईने में क़ैद शबीह
तू सजा दे अपने लिए
मनचाही एक परछाई नई
अंग्रेज कर गए बटवारा
अब अमरीकी पुकारे भाईचारा
निकलेगी जब अगली गोली
होगा छल्ली छल्ली
फिर एक बेकसूर सीना
देना जरूर तुम तसल्ली
कहकर कि बस
सीज़फायर तक ही तो हैं रोना
एहसान मनाएगी तुम्हारा
गम में डूबी हर ममता
ऐसा नहीं है कि अब
नहीं लगती बारिश सुहानी
कोयल को सुनकर आज भी
गुनगुना लेता हूँ मैं भी धुन वही
ऐसा नहीं है कि अब
सपनों की हैं कोई कमी
अपनी कमियों को आज भी
कामयाबी में बदलने का है यकीन
ऐसा नहीं है कि अब
रुकी हुईं है जिंदगी कही
अगर बंद कर लूं मुठ्ठी आज भी
हौसला है वक्त को काबू कर लूं वही
मगर अफसोस है ये अब
आदत आपकी हमें कुछ ऐसी थी
की जब से हुईं परे दिल से वो मौजूदगी
जाहिल ढूंढता रहता है वजह मुस्कुराने की