बे-निशाँ

एक पल जिसमें कोई ख्वाईश न हो
कुछ क़दम जिनमें कोई मक़सद न हो
एक धड़कन जिसमें कोई तशविश न हो
कुछ राहें जिनमें कोई जुस्तजू न हो
एक कारवां जिसे मंज़िल की तलाश न हो
कुछ हसरतें जिन्हें पूरी होने की आरज़ू न हो

अजनबी

आपकी सदा में कोई ख़ता न थी,
मेरे दर को दस्तक की आदत न थी
तन्हाई इकलौती दौलत है मेरी
गिनते-गिनते जिसे ये उम्र कटी
अपनों से आस सलीक़े से थी छोड़ी
वो सलीक़ा तोड़ा एक नज़र ने तुम्हारी
जिन दीवारों में ज़िंदगी थी छिपी
तुम्हारी मुस्कुराहट से दरारें पड़ गईं
उम्मीद जो तेरी आँखों में है जमी
उससे डर लगता है, ए अजनबी

इत्तला

हाथों की कुछ चंद लकीरें
या सड़क किनारे बैठा तोता
आसमान में ही कोई बादल
या आँगन में खेलता वो झोंका

काश कभी तो कोई
इस लौ को भनक देता
देता आने वाले तूफ़ान की
कोई तो छोटी सी इत्तला

जुस्तजू

ए दिल ए नादान, तेरी फ़ितरत समझने में अर्सा बीत गया,
मंज़िलों की आपाधापी में, मैं ख़ुद को खोता रह गया।
हर मक़ाम पे तूने, एक नई तलाश का ऐलान कर दिया,
तेरी ख्वाहिशों की दौड़ में, ज़िंदगी का तमाशा बन गया।


अब एक पल जी लेने दे, जिसमें कोई इंतज़ार न हो,
एक क़दम बढ़ा लेने दे, जिसमें कोई मक़सद न हो,
एक धड़कन सुन लेने दे, जिसमें कोई चाह न हो,
एक साँस ले लेने दे, जिसमें कोई जुस्तजू न हो।

Feelings के चौकीदार

“इतना smile करोगे तो
कौन लेगा seriously तुम्हें?”,
“थोड़ा मुस्कुराओगे मेहमानों में
तो पैसे नहीं कटेंगे bank से”,
“गुस्सा तुम क्यों हो रहें हो
बात तो सही हैं ना उनकी?”,
“पैसे ले गया जादा तुमसे वो
गुस्सा कैसे नहीं आ रहाँ तुम्हे?”,
“चिल्लाओं मत उनपे तुम,
भगवान का रूप होते हैं बच्चे”,
“इतने नरमी से पेश आओगे,
तो बच्चे हाथ से निकल जाएंगे”,
“Match ही तो हैं कोई जंग नहीं
इतना emotional क्यों हो रहें हो?”,
“ऐसे आराम से कैसे सो सकते हो
किसी का दर्द कभी समझ पाए हो?”

औक़ात

निकले थे घर से कभी
दुनिया बदलने हम भी
ना जाने कब हुई पराई
हम से ही हमारी परछाई

आईने में देता है दिखाई
रोज़ नया अजनबी कोई
पूछता रहता है एक पता
है नाम बड़ा जाना-पहचाना

ऐसा नहीं है हरगिज़
कि हार मान चुके हैं हम
तू दिखा दे खुदा तेरा दम
बंदा पी लेगा एक और ग़म

फिर आँसुओं की कहीं 
आज बरसात होगी
ज़िंदगी हमको हमारी
औक़ात दिखा देगी

शुक्र है

शुक्र है कि सिर्फ़ चाहने से
दोबारा जी पाता हूँ उन यादों में,
वरना ना जाने कितनी तस्वीरों में
उलझा देता ये आवारा दिल।


शुक्र है कि सिर्फ़ चाहने से
नहीं बनती किसी की क़िस्मत,
वरना ना जाने कितनी तक़दीरों में
उलझा देता ये आवारा दिल।

कोहरा

ये कोहरा तो पिघल जाएगा,
आफताब की आहट से,
कमबख्त के साथ लिखे,
जो रातभर हमने शिकवे,
दर्द कुछ स्याही में लिपटे,
क्या होंगे कभी वो भी फीके?

खामोशी

अनकहे अल्फाजों की भीड़ में
खिल रहीं ख्वाहिशें
समेटकर मानो पूरी जिंदगी
यूंही एक पल में


इन सांसों की मौजूदगी होगी
तब्दील जब यादों में
कोशिश करेंगे ना होगा गम कोई
आपकी कशिश में


करके मगर तकाजा इजहार का
इस मुलाकात की
ना छीन लो मिल्कियत इकलौती
हमसे हमारी खामोशी

परछाई

अपने ग़रज़ के लिए नहीं
अपने वजूद के लिए नहीं
अपने सपनों के लिए नहीं
अपने अपनो के लिए नहीं

समेट ले ये पल जरा
बस यूँ ही, बेवजह ज़रा
जैसे एक बादल आवारा
तू उतार दे ये बोझ सारा

ढूंढ ले वो डगर जहाँ
किसी को तेरा इंतजार नहीं
पकड़ वो रास्ता जहाँ
मंज़िल की तुझे दरकार नहीं

तू बुझा दे आज सारे दिये
तू मिटा दे आईने में क़ैद शबीह
तू सजा दे अपने लिए
मनचाही एक परछाई नई