वजह

ऐसा नहीं है कि अब
नहीं लगती बारिश सुहानी
कोयल को सुनकर आज भी
गुनगुना लेता हूँ मैं भी धुन वही

ऐसा नहीं है कि अब
सपनों की हैं कोई कमी
अपनी कमियों को आज भी
कामयाबी में बदलने का है यकीन

ऐसा नहीं है कि अब
रुकी हुईं है जिंदगी कही
अगर बंद कर लूं मुठ्ठी आज भी
हौसला है वक्त को काबू कर लूं वही

मगर अफसोस है ये अब
आदत आपकी हमें कुछ ऐसी थी
की जब से हुईं परे दिल से वो मौजूदगी
जाहिल ढूंढता रहता है वजह मुस्कुराने की

गुत्थी

ये शाम ढल क्यों नहीं रहीं?
ये पहेली सुलझ क्यों नहीं रहीं?
आसमान में तारे तो हैं 
पर रौशनी अधूरी सी क्यों?
हवा में खुशबू तो है
पर महक से वो परे क्यों?
ये धड़कन कुछ रुकी सी हैं क्यों?
ये जिंदगी कुछ गुत्थी सी हैं क्यों?

दास्तान

मोहब्बत में कुर्बानी की दास्तान
किसी मजनू से मत पूछना
तुम पूछना उस बादल से
जिसने काटी अनगिनत दूरियाँ
सहकर जाने कितनी आँधियाँ
सिर्फ इस एक उम्मीद में
की जब एक दिन मुलाकात होगी
तब कोई बरसात नहीं रुकेगी
वह अपनी मोहब्बत में घुल जाएगा
इस धरती के हर ज़र्रे में बिखरकर
अपना सारा वजूद मिटाकर

Pull Request

कितनी आसान होती जिंदगी अगर
हर मुश्किल मोड पे कोई आकर
थोड़ा सा इस दिल में झांककर 
दे देता बस एक P.R. लिखकर
और मैं बदल जाता तब हसकर
बिना conflict के merge होकर

गम

इन निगाहों को इस नकाब से

रिहा ना कीजिएगा

आपके आंसू इस जमाने से

जाहिर ना कीजिएगा

अगर हर आशिक आपका इस गम को

पीने में लग जाएगा

खत्म हो कर शराब हर मयखाने को

फिर ताला लग जाएगा

अंजान

कलम से कुछ लब्ज़
जुदा ना हो पाएं
दिल से कुछ ख्वाइशें
अलविदा ना हो पाएं

चाहें आप हमसे कभी
मेहरबान ना हो पाएं
इन नज्मों से आप कभी
अंजान ना हो पाएं

कबर

बिक रही हैं ज़िंदगियाँ
पत्थरों के दाम
क्या खोज रहाँ इन्सान
खुद ही से हैं वो बेईमान

तान कर खड़े हैं सीने
बिना किसी खबर
खोद ली हैं हमने
कब से अपनी ही कबर

मौजूदगी

लब्ज़ कही कागज पे
आज उतर ना जाए

जज़्बात कही निगाहों से
जाहिर ना हो जाए

ख्वाइशें कही सीने से
परे ना हो जाए

आपको क्या खबर
आपकी मौजूदगी का असर

मेरी धड़कनों से कही इश्क मेरा
बयान ना हो जाए

तूफान

यादों से सी लेंगे
ज़ख्म तन्हाई के
ढूंढ लेंगे लत कोई
वक़्त की पैमाइश के लिए

मुश्किलें तो तब हैं
जब बरसात आएगी
छोटी सी बूंदे जब
दिल को दस्तक दे जाएगी

जब अपने अंदर का तूफान
खुद ना रोक सका आसमान
आँखों की क्या हैसियत
तेहज़ीब में पेश आएँगी

दोस्ती

कलम में स्याही कुछ
सहमी सी हैं
जुबान पर लब्ज़ों की 
कमी सी हैं
चंद साँसे भी आज
रुकी सी हैं
ये आदत तो अब 
पुरानी सी हैं
खामोशी से अपनी  
दोस्ती सी हैं