ए दिल ए नादान, तेरी फ़ितरत समझने में अर्सा बीत गया,
मंज़िलों की आपाधापी में, मैं ख़ुद को खोता रह गया।
हर मक़ाम पे तूने, एक नई तलाश का ऐलान कर दिया,
तेरी ख्वाहिशों की दौड़ में, ज़िंदगी का तमाशा बन गया।
अब एक पल जी लेने दे, जिसमें कोई इंतज़ार न हो,
एक क़दम बढ़ा लेने दे, जिसमें कोई मक़सद न हो,
एक धड़कन सुन लेने दे, जिसमें कोई चाह न हो,
एक साँस ले लेने दे, जिसमें कोई जुस्तजू न हो।