इन निगाहों को इस नकाब से
रिहा ना कीजिएगा
आपके आंसू इस जमाने से
जाहिर ना कीजिएगा
अगर हर आशिक आपका इस गम को
पीने में लग जाएगा
खत्म हो कर शराब हर मयखाने को
फिर ताला लग जाएगा
Poems by Rohit Malekar
इन निगाहों को इस नकाब से
रिहा ना कीजिएगा
आपके आंसू इस जमाने से
जाहिर ना कीजिएगा
अगर हर आशिक आपका इस गम को
पीने में लग जाएगा
खत्म हो कर शराब हर मयखाने को
फिर ताला लग जाएगा
सावली बि गिळून
सांज गेली ढळून
तिच्या संगं जळून
आणि यक सपान
इस्कटल्यालं नशीब
उतरवलं थोडं ऋण
मागच्या येका जन्माचं
असंल राहिलेलं देणं
कुठे सरले दिस
जीव होतो कासावीस
भरून आलं उरात
मोठी एक शंका मनात
आहेस तु खरंच आठवण
की अर्धवट एक खोटं स्वप्न
माझ्या आयुष्याच्या गलबल्यात
टिकल्या नाहीत तुझ्या कविता
उगाच नाही काठावर आता
कुठेच मिळत जोड्या
विखुरल्यात सर्वत्र फक्त
तुटलेल्या एक एक शिंपल्या
कलम से कुछ लब्ज़
जुदा ना हो पाएं
दिल से कुछ ख्वाइशें
अलविदा ना हो पाएं
चाहें आप हमसे कभी
मेहरबान ना हो पाएं
इन नज्मों से आप कभी
अंजान ना हो पाएं
बिक रही हैं ज़िंदगियाँ
पत्थरों के दाम
क्या खोज रहाँ इन्सान
खुद ही से हैं वो बेईमान
तान कर खड़े हैं सीने
बिना किसी खबर
खोद ली हैं हमने
कब से अपनी ही कबर
हिरव्यागार खोऱ्यात
जसं गवताचं पातं
तुझी आठवण
रमली माझ्या मनात
तुझी संगत
साधायचं जसं वेडं
तसच व्याकूळ
होतं आजही थोडं
सांगायचं म्हटलं
तर गोष्ट साधीच
शेवटची पानं
बरी आहेत अर्धीच
Like an unknown turn
With a poker face
And traps and temptation
In its masquerade
When there is no telling
When the sun shall show
Ever heard the calling
Of the purple sky above?
Like a clinched fist
On a barbed wire
My heart seethes
Wrapped in a fire
I clean the stains
Of the spilled shame
I sweep the pieces
Off the life’s frame
I scavenge for choices
I hunt for the meaning
I seek for the vices
To keep me dreaming
With my hands tied
My silent screams soar
Trapped in a future
I wasn’t meant for
यादों से सी लेंगे
ज़ख्म तन्हाई के
ढूंढ लेंगे लत कोई
वक़्त की पैमाइश के लिए
मुश्किलें तो तब हैं
जब बरसात आएगी
छोटी सी बूंदे जब
दिल को दस्तक दे जाएगी
जब अपने अंदर का तूफान
खुद ना रोक सका आसमान
आँखों की क्या हैसियत
तेहज़ीब में पेश आएँगी
With muddled memories
And biased thoughts
From tilted perspectives
And choices flawed
We spend a lifetime
Blinded with distortions
But blame the machine
Trained on our ways
Of erring in decisions
Calling it hallucinations!