परछाई

अपने ग़रज़ के लिए नहीं
अपने वजूद के लिए नहीं
अपने सपनों के लिए नहीं
अपने अपनो के लिए नहीं

समेट ले ये पल जरा
बस यूँ ही, बेवजह ज़रा
जैसे एक बादल आवारा
तू उतार दे ये बोझ सारा

ढूंढ ले वो डगर जहाँ
किसी को तेरा इंतजार नहीं
पकड़ वो रास्ता जहाँ
मंज़िल की तुझे दरकार नहीं

तू बुझा दे आज सारे दिये
तू मिटा दे आईने में क़ैद शबीह
तू सजा दे अपने लिए
मनचाही एक परछाई नई

सीज़फायर

अंग्रेज कर गए बटवारा
अब अमरीकी पुकारे भाईचारा
निकलेगी जब अगली गोली
होगा छल्ली छल्ली
फिर एक बेकसूर सीना
देना जरूर तुम तसल्ली
कहकर कि बस
सीज़फायर तक ही तो हैं रोना
एहसान मनाएगी तुम्हारा
गम में डूबी हर ममता

मध्यान्ह

भर दुपारी उन्हात
आयुष्याचं मध्यान्ह जाणवलं
संध्याकाळ होणार आता
ह्या विचारानं घर मांडलं
थोडसं का होईना मग
काळजात कसं धस्स झालं

सकाळपासून दंगा घालण्यात
कसं अर्ध जगणं संपलं
मनाला नाही मानवत मात्र
अधून मधून थकल्यासारखं वाटतं
वळते तोपर्यंत वळवायची आता मूठ
घाण्याबाहेर बैल जाणार कुठं

गुत्थी

ये शाम ढल क्यों नहीं रहीं?
ये पहेली सुलझ क्यों नहीं रहीं?
आसमान में तारे तो हैं 
पर रौशनी अधूरी सी क्यों?
हवा में खुशबू तो है
पर महक से वो परे क्यों?
ये धड़कन कुछ रुकी सी हैं क्यों?
ये जिंदगी कुछ गुत्थी सी हैं क्यों?

Pull Request

कितनी आसान होती जिंदगी अगर
हर मुश्किल मोड पे कोई आकर
थोड़ा सा इस दिल में झांककर 
दे देता बस एक P.R. लिखकर
और मैं बदल जाता तब हसकर
बिना conflict के merge होकर

गम

इन निगाहों को इस नकाब से

रिहा ना कीजिएगा

आपके आंसू इस जमाने से

जाहिर ना कीजिएगा

अगर हर आशिक आपका इस गम को

पीने में लग जाएगा

खत्म हो कर शराब हर मयखाने को

फिर ताला लग जाएगा

देणं

सावली बि गिळून

सांज गेली ढळून

तिच्या संगं जळून

आणि यक सपान

इस्कटल्यालं नशीब

उतरवलं थोडं ऋण

मागच्या येका जन्माचं

असंल राहिलेलं देणं

शिंपल्या

कुठे सरले दिस
जीव होतो कासावीस
भरून आलं उरात
मोठी एक शंका मनात
आहेस तु खरंच आठवण
की अर्धवट एक खोटं स्वप्न

माझ्या आयुष्याच्या गलबल्यात
टिकल्या नाहीत तुझ्या कविता
उगाच नाही काठावर आता
कुठेच मिळत जोड्या
विखुरल्यात सर्वत्र फक्त
तुटलेल्या एक एक शिंपल्या

अंजान

कलम से कुछ लब्ज़
जुदा ना हो पाएं
दिल से कुछ ख्वाइशें
अलविदा ना हो पाएं

चाहें आप हमसे कभी
मेहरबान ना हो पाएं
इन नज्मों से आप कभी
अंजान ना हो पाएं

कबर

बिक रही हैं ज़िंदगियाँ
पत्थरों के दाम
क्या खोज रहाँ इन्सान
खुद ही से हैं वो बेईमान

तान कर खड़े हैं सीने
बिना किसी खबर
खोद ली हैं हमने
कब से अपनी ही कबर