यादों से सी लेंगे
ज़ख्म तन्हाई के
ढूंढ लेंगे लत कोई
वक़्त की पैमाइश के लिए
मुश्किलें तो तब हैं
जब बरसात आएगी
छोटी सी बूंदे जब
दिल को दस्तक दे जाएगी
जब अपने अंदर का तूफान
खुद ना रोक सका आसमान
आँखों की क्या हैसियत
तेहज़ीब में पेश आएँगी
Poems by Rohit Malekar
यादों से सी लेंगे
ज़ख्म तन्हाई के
ढूंढ लेंगे लत कोई
वक़्त की पैमाइश के लिए
मुश्किलें तो तब हैं
जब बरसात आएगी
छोटी सी बूंदे जब
दिल को दस्तक दे जाएगी
जब अपने अंदर का तूफान
खुद ना रोक सका आसमान
आँखों की क्या हैसियत
तेहज़ीब में पेश आएँगी
With muddled memories
And biased thoughts
From tilted perspectives
And choices flawed
We spend a lifetime
Blinded with distortions
But blame the machine
Trained on our ways
Of erring in decisions
Calling it hallucinations!
When you cast a bullet
Can you also emboss on it
With certainty the faith
You wish to desecrate?
At the soil drenched in blood
Can you stare long enough
To quote the side from where
Came the dreams that bled?
When you hear cries of a mate
Can you dare find the words
To solace the broken soul
Devoid of revenge and hate?
कलम में स्याही कुछ
सहमी सी हैं
जुबान पर लब्ज़ों की
कमी सी हैं
चंद साँसे भी आज
रुकी सी हैं
ये आदत तो अब
पुरानी सी हैं
खामोशी से अपनी
दोस्ती सी हैं
गैरों को पेश कर
आज खूब रोशनाई
तूने घरौंदे की
क्या इज्जत बढ़ाई
बजाओ तालियाँ कही
मातम न दे सुनाई
कुछ चित्ताएं अंदर
अभी भी हैं जल रहीं
“I defy you to show me discrimination” – India’s External Affairs Minister at Washington DC when asked on minority rights.
आपकी गैरमौजूदगी की आदत हो गई
आपके साएं की तलब भी मिट गई
अब याद न दिलाओ दिन जब गुलज़ार थे
अब कांटो से खेलने की लत लग गई
जमीन से निकली हैं चीखें
कब तक गूंगे बनें रहोगे?
अतीत को अनदेखा कर
क्या भविष्य बनाओगे?
क्या विधान पढ़ोगे?
क्या कानून लिखोगे?
नए इस दरबार में जाने
किसकी हिफाजत करोगे?
#WrestlersProtests #ParliamentNewBuilding
I do not know
How to
Get used to
Being without you
I do not know
Where do
I move to
Search for you
I do not know
When shall
The morning befall
When I find you
I do not know
Why do
I let my heart
Starve for you
खयालों में कुछ नमी सी हैं
नींद भी कुछ खफा सी हैं
दिल में सुकून की कमी सी हैं
आज रात वफ़ा बैचैनी से हैं
कुछ अधूरे नगमो को कैसे
तुम्हारे नाजो अंदाज से भर दूं
तुम्हारे सोहबत में मैं कैसे
मसरूर बन कर रह जाऊ
खोए हुए कदमों को कैसे
अनदेखी राहों पर ले जाऊ
बीतें कुछ लम्हों को कैसे
तुम्हारी आरजूओं से भर दूं
इस वक्त को मैं कैसे
बेइख्तियार कर दूं
जिंदगी की कुछ सुर्खियां कैसे
तुम्हारे साथ फिर से जी लूं