Oblivion

Isn’t there a certain
joy in oblivion?

When I can laugh my heart out
And cherish the show from the crowd
When you there on the stage
Can neither express agony nor rage?

You parrot a script you didn’t write
For a character that ain’t suit you right
And what happens to those labels all
When the curtain commits that certain fall?

When I walk with my joys few
Can you really find you?

दस्तक

कुछ दोस्तों ने मिलके
दुश्मनों को दस्तखत दे दी
कुछ अपनों ने ही अपनी
सारी मिट्टी निलाम कर दी
कल शायद सूरज भी
सेहर में सहम जाएगा
कोई एक अजनबी जब
बंदूक से दस्तक देगा

On Afghanistan, August, 2021

अजनबी

समशान घाट की चीखों से दूर
सर पे हाथ रखे था कोई बैठा
“जानपहचान का था या था कोई सगा?”
कर हिम्मत मैंने उसे पूछा
“ना कोई मेरा सगा ना कोई पराया,
पर इंसान, आज तो मैं भी थक गया”
कहकर यमराज अकेले ही रो दिया

#covid19

थोड़ा जी लेने दे

आज तूफान को हँस लेने दे
अंधेरे को तू छा जाने दे
थोड़ा खून बह लेने दे
दिल पे घाव लग जाने दे

थोड़ा बोझ समंदर को भी लेने दे
इस कश्ती को डूब जाने दे
बादल को थोड़ा पिघल लेने दे
बरसात से आंसू धूल जाने दे

आंधी को भी थक जाने दे
धड़कन दिल की सुन लेने दे
तक़दीर को भी जरा हैरान होने दे
अपने आप को थोड़ा मुस्करा लेने दे

जीजान

लो फिर से हो गए खड़े चौराहें पे
चाहनेवालों को देने फूल के ठेले

अब कुछ मजनू और कुछ लैला खरीदेंगे
अपने इश्क़ का सबूत थोड़े थोड़े सिक्कों में

अरे इस गुल को तो बक्श दिया होता
तुम्हारे चंद रोज के बुखार में कुर्बान ना होता

अगर हैं शौंख मोहब्बत सरहाने का तो सुनो
एक भवरा ढूंढ रहां हैं खोये हुए जीजान को

Let My Country Awake, May Be

Where thoughts are censored and rumors roar loud;
Where the facts are manufactured;
Where the world has been broken up into communities by caste and creed;
Where every dissent is seen as contempt;
Where we elect those who have the least respect for the law;
Where selfish interests fuel the fire to burn all sense and reason;
Where one needs to prove their patriotism by pleasing those in power –
Into that swamp, my Gurudev, our country lays in slumber.

Inspired by “Let My Country Awake” by Rabindranath Tagore

क्या खोया, क्या पाया?

ये बेक़रार तेरी आहट में
इत्मीनान पाता हैं
ये मोहताज तेरे साये में
पनाह पाता हैं
ये मुसाफिर तेरी जुस्तजू में
मंजिल पाता हैं
ये कंजर तेरी निगाहों में
जहाँ पाता हैं
तू नहीं यहाँ मगर
तेरी जुदाई सहकर
ये काफिर तेरी हस्ती में
खुदाई पाता हैं

अजनबियत

क्यों ये दिल रखता हैं कोई ख्वाइश
जब रिश्तों ने ही की सिर्फ नुमाइश
फिर कोई गैर क्यों सुने तेरी गुजारिश

काश कोई आइना बनाता तस्वीर ऐसी
खुद को थोड़ा ढूंढ लेता मैं इस डगर
अक्स में होते रंग जज्बातों के अगर

दिख जाते फिर एक साथ हिरसात
बंद किले में मेरे सारे एहसासत
साथ लिए जानी पहचानी अजनबियत