अधून मधून पावसात
जाणवते एक कमजोरी
तुझ्या सोबत घेतलेल्या
काही श्र्वासांची शिदोरी
आणि व्यक्त ना केलेल्या
काही भावनांची साठवण
घेऊन कोसळते सर जेव्हा
अश्रुत चिंब तुझी आठवण
कोहरा
ये कोहरा तो पिघल जाएगा,
आफताब की आहट से,
कमबख्त के साथ लिखे,
जो रातभर हमने शिकवे,
दर्द कुछ स्याही में लिपटे,
क्या होंगे कभी वो भी फीके?
राजगडाची रात्र
किती डोळ्यात वाट
आता झाली पहाट
आला पहिला प्रहर
देवा, का हा कहर?
तो औरंग्या शापित
त्याचा मुठीत काबीज
झाला अर्धा मुलुख
काय करल तो सुलुख?
रोवलंय माझ्या लेकरानं
स्वराज्यचं अनमोल बीज
तोवर नाही त्याला निज
त्याची तुला काय चीज?
नको चांदणं अंगणात
माझ्या छाव्यास ते दाव
त्याचं पाऊल जंगलात
तोवर तू पाण्यात
Jijamata endured a long and harrowing silence, with weeks of rumours whispering Shivaji’s recapture or worse, his death, as he travelled in disguise through hostile Mughal territory after his daring escape from Agra. This is an attempt to pen a sleepless night for a deeply devout parent who had already endured the loss of one son.
खामोशी
अनकहे अल्फाजों की भीड़ में
खिल रहीं ख्वाहिशें
समेटकर मानो पूरी जिंदगी
यूंही एक पल में
इन सांसों की मौजूदगी होगी
तब्दील जब यादों में
कोशिश करेंगे ना होगा गम कोई
आपकी कशिश में
करके मगर तकाजा इजहार का
इस मुलाकात की
ना छीन लो मिल्कियत इकलौती
हमसे हमारी खामोशी
परछाई
अपने ग़रज़ के लिए नहीं
अपने वजूद के लिए नहीं
अपने सपनों के लिए नहीं
अपने अपनो के लिए नहीं
समेट ले ये पल जरा
बस यूँ ही, बेवजह ज़रा
जैसे एक बादल आवारा
तू उतार दे ये बोझ सारा
ढूंढ ले वो डगर जहाँ
किसी को तेरा इंतजार नहीं
पकड़ वो रास्ता जहाँ
मंज़िल की तुझे दरकार नहीं
तू बुझा दे आज सारे दिये
तू मिटा दे आईने में क़ैद शबीह
तू सजा दे अपने लिए
मनचाही एक परछाई नई
सीज़फायर
अंग्रेज कर गए बटवारा
अब अमरीकी पुकारे भाईचारा
निकलेगी जब अगली गोली
होगा छल्ली छल्ली
फिर एक बेकसूर सीना
देना जरूर तुम तसल्ली
कहकर कि बस
सीज़फायर तक ही तो हैं रोना
एहसान मनाएगी तुम्हारा
गम में डूबी हर ममता
Unshaken
The deepest depths
the Maker could carve
must bow in awe—
dwarfed and dimmed
by the boundless blaze
of your unflinching gaze,
filled with love, unshaken.
वजह
ऐसा नहीं है कि अब
नहीं लगती बारिश सुहानी
कोयल को सुनकर आज भी
गुनगुना लेता हूँ मैं भी धुन वही
ऐसा नहीं है कि अब
सपनों की हैं कोई कमी
अपनी कमियों को आज भी
कामयाबी में बदलने का है यकीन
ऐसा नहीं है कि अब
रुकी हुईं है जिंदगी कही
अगर बंद कर लूं मुठ्ठी आज भी
हौसला है वक्त को काबू कर लूं वही
मगर अफसोस है ये अब
आदत आपकी हमें कुछ ऐसी थी
की जब से हुईं परे दिल से वो मौजूदगी
जाहिल ढूंढता रहता है वजह मुस्कुराने की
मध्यान्ह
भर दुपारी उन्हात
आयुष्याचं मध्यान्ह जाणवलं
संध्याकाळ होणार आता
ह्या विचारानं घर मांडलं
थोडसं का होईना मग
काळजात कसं धस्स झालं
सकाळपासून दंगा घालण्यात
कसं अर्ध जगणं संपलं
मनाला नाही मानवत मात्र
अधून मधून थकल्यासारखं वाटतं
वळते तोपर्यंत वळवायची आता मूठ
घाण्याबाहेर बैल जाणार कुठं
गुत्थी
ये शाम ढल क्यों नहीं रहीं?
ये पहेली सुलझ क्यों नहीं रहीं?
आसमान में तारे तो हैं
पर रौशनी अधूरी सी क्यों?
हवा में खुशबू तो है
पर महक से वो परे क्यों?
ये धड़कन कुछ रुकी सी हैं क्यों?
ये जिंदगी कुछ गुत्थी सी हैं क्यों?