परछाई

अपने ग़रज़ के लिए नहीं
अपने वजूद के लिए नहीं
अपने सपनों के लिए नहीं
अपने अपनो के लिए नहीं

समेट ले ये पल जरा
बस यूँ ही, बेवजह ज़रा
जैसे एक बादल आवारा
तू उतार दे ये बोझ सारा

ढूंढ ले वो डगर जहाँ
किसी को तेरा इंतजार नहीं
पकड़ वो रास्ता जहाँ
मंज़िल की तुझे दरकार नहीं

तू बुझा दे आज सारे दिये
तू मिटा दे आईने में क़ैद शबीह
तू सजा दे अपने लिए
मनचाही एक परछाई नई

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