कलम में स्याही कुछ
सहमी सी हैं
जुबान पर लब्ज़ों की
कमी सी हैं
चंद साँसे भी आज
रुकी सी हैं
ये आदत तो अब
पुरानी सी हैं
खामोशी से अपनी
दोस्ती सी हैं
Poems by Rohit Malekar
कलम में स्याही कुछ
सहमी सी हैं
जुबान पर लब्ज़ों की
कमी सी हैं
चंद साँसे भी आज
रुकी सी हैं
ये आदत तो अब
पुरानी सी हैं
खामोशी से अपनी
दोस्ती सी हैं