हस्ती

वक़्त को यूँ ठहराया ना करो
चाँद को यूँ जलाया ना करो
मक़सद हमारे यूँ बदलाया ना करो
आदत तुम्हारी यूँ लगाया ना करो

बेजार दिल ने की शिकायत खुदा से
क्यों तराशा तेरे चेहरे को इतने इत्मिनान से
बोला इसलिए समाया तुझमे कायनात को
ताकि मेरी हस्ती पे शक तुम किया ना करो

जीजान

लो फिर से हो गए खड़े चौराहें पे
चाहनेवालों को देने फूल के ठेले

अब कुछ मजनू और कुछ लैला खरीदेंगे
अपने इश्क़ का सबूत थोड़े थोड़े सिक्कों में

अरे इस गुल को तो बक्श दिया होता
तुम्हारे चंद रोज के बुखार में कुर्बान ना होता

अगर हैं शौंख मोहब्बत सरहाने का तो सुनो
एक भवरा ढूंढ रहां हैं खोये हुए जीजान को

क्या खोया, क्या पाया?

ये बेक़रार तेरी आहट में
इत्मीनान पाता हैं
ये मोहताज तेरे साये में
पनाह पाता हैं
ये मुसाफिर तेरी जुस्तजू में
मंजिल पाता हैं
ये कंजर तेरी निगाहों में
जहाँ पाता हैं
तू नहीं यहाँ मगर
तेरी जुदाई सहकर
ये काफिर तेरी हस्ती में
खुदाई पाता हैं

पल

जिंदगी जूनून ना बन जाए
हसरत चाहत न बन जाए
अपने लटों को उँगलियों से ना छेड़िये
अपनी निगाहों से हमें कैद ना कीजिये
ये पल पूरी जिंदगी ना बन जाए
आप हमारी कायनात ना बन जाए

बेनाम

कुछ मंजिलो के रास्ते नहीं  होते
उन मुसाफ़िरों के काफिले नहीं होते
कुछ जज्बातों के अल्फ़ाज़ नहीं होते
उन खामोशियों में हमसफर नहीं होते

कुछ दुआओं की वजह नहीं होती
उन चाहतो में खुदगर्जी नहीं होती
कुछ ख्वाइशें अंजाम नहीं होती
उन यादों में कड़वाहट नहीं होती

कुछ पल इत्मिनान नहीं होते
उन मौजुदगियों में पराये नहीं होते
कुछ इकरार बयान नहीं होते
उन रिश्तों के नाम नहीं होते

You and Me

You and me
We fight so hard
Every word
Like a flying shard

You and me
And days of yonder
How far we’ve come
Do you remember?

You and me
Why do the eyes weep?
In our arms
When we now seep

You and me
In a gaze deep
The hugs last long
We fail to sleep

You and me
A future we wrote
But somewhere along
We forgot to dote

You and me
What rocked our boat?
Love slowly sinks
Hope falters to float

शिवाई

जन्म झाला शिवनेरी ।
रयत ऋणी जीजाई ।।
शप्पथ स्वराज्याची ।
रायरेश्वरी शिवलिंग साक्षी ।।

भेदरली आदिलशाही ।
पाहून रक्तरंजित भवानी ।।
धडकी मुगल दरबारी ।
तो नतमस्तक रामदासी ।।

उभा अखंड सह्याद्री ।
घेऊन दरी राई ।।
संगे समुद्र अरबी ।
शिवगुण गायी ।।

मग काय करू शाहिरी ।
कोड्यात हा गोंधळी ।।
खंत एकच तुळजाई ।
नशिबा नव्हती शिवाई ।।

Shivaji, who was born to Jijabai at the fort of Shivneri, renounced the inherited comforts and swore to establish self-rule for the people of the land. He shook the tyrannical powers of the Adilshah of Bijapur and the Mughal empire in Delhi fighting many violent battles while humbly accepting the teachings of Sant Ramdas. When today the hills of Sahyadri and the waves of the Arabian sea sing his praises, neither can I better them nor can I shed my envy for unlike them, my life could not witness the acts of his valor.

The format of this verse is called Pawada. Over the centuries, it was the song of the wandering poets in Maharashtra called Gondhali. In a prescient observation, Harry Acworth wrote the following in his book, “Ballads of the Marathas”, published in 1894, “…the advantages of civilization will no doubt, before many years are over, be too much for these products of a time when the steam-engine and the high school were not.”