अजनबियत

क्यों ये दिल रखता हैं कोई ख्वाइश
जब रिश्तों ने ही की सिर्फ नुमाइश
फिर कोई गैर क्यों सुने तेरी गुजारिश

काश कोई आइना बनाता तस्वीर ऐसी
खुद को थोड़ा ढूंढ लेता मैं इस डगर
अक्स में होते रंग जज्बातों के अगर

दिख जाते फिर एक साथ हिरसात
बंद किले में मेरे सारे एहसासत
साथ लिए जानी पहचानी अजनबियत

पल

जिंदगी जूनून ना बन जाए
हसरत चाहत न बन जाए
अपने लटों को उँगलियों से ना छेड़िये
अपनी निगाहों से हमें कैद ना कीजिये
ये पल पूरी जिंदगी ना बन जाए
आप हमारी कायनात ना बन जाए

मजदूर

पूंछती हैं राहें तुझे ए हमसफर
तेरी मंज़िल कब होगी करीब

जब तूफान को हराकर
चिड़िया को होगी तबस्सुम नसीब
तब सुला देंगे ये बेख्वाब रात
कह गया कोई एक गरीब

पूंछती हैं राहें तुझे ए हमसफर
कब तक लड़ेगा तू बिना सहारे

भूख को कर दफ़न अरसा हो गया
मातम में हम अकेले ही रो लिए
छोड़ रंजिश अभी उम्मीद कायम हैं
इस बरसात ने आँसू जो पोंछ दिए

Tens of thousands of impoverished migrant workers have been forced to leave cities and towns where they had toiled for years building homes and roads after they were abandoned by their employers — casualties of a nationwide lockdown in India to stop the virus from spreading (2020).

कैदी 

जितने ऊंचे
हंसी के फवारे
उससे गहरे
ग़म के साये

डूबते हुए अनेक
दुविधा के भवंडर में
शिकायत कर रही
अधूरी ख्वाहिशें

“कुछ और ब्याज
बाकी है”, भी कह रहे
ताकते हुए अतीत से
अनदेखे घाव मेरे

जैसे कई अजनबी
एक डूबती नाव में
हम सारे कैदी फंसे
इस एक जिस्म में

ख़्वाहिश

डरी हुई सहमी सी
अँधेरे एक कोने में
अकेले ही जूझ रही
तूफ़ान से टकराती
जैसे फहराती मोमबत्ती

“तुम्हे खोने का हैं डर नहीं
मुझे ना होने का ग़म नहीं
वादा करो छोड़ ना देना
तुम सपने देखना कहीं”
कह गई एक ख्वाइश मेरी

इन्तेहाँ

इन्सान आज फिर
तू क्यों हैं खोया?

हर वह मकाम
जो तूने ना पाया
उस हर कदम पे
तू जोश से रोया

हर उस मंजिल को
जिसने तुझे अपनाया
छोड़ काफिर उसे
दौड़ा तेरा साया

तेरी आदतें देख
तेरा ख़ुदा भी सहमाया
गर्जे तेरी सुन पंहुचा
अपनी वजूद की इन्तेहाँ

इन्सान आज फिर
तू क्यों हैं खोया?

बेनाम

कुछ मंजिलो के रास्ते नहीं  होते
उन मुसाफ़िरों के काफिले नहीं होते
कुछ जज्बातों के अल्फ़ाज़ नहीं होते
उन खामोशियों में हमसफर नहीं होते

कुछ दुआओं की वजह नहीं होती
उन चाहतो में खुदगर्जी नहीं होती
कुछ ख्वाइशें अंजाम नहीं होती
उन यादों में कड़वाहट नहीं होती

कुछ पल इत्मिनान नहीं होते
उन मौजुदगियों में पराये नहीं होते
कुछ इकरार बयान नहीं होते
उन रिश्तों के नाम नहीं होते

दूरी

तेरे खयालों से खुद को दूर कर सकूं
इतनी अदब मेरे दिल में कहाँ
ये जुर्म तुझसे कबूल कर सकूं
इतनी तू मेरे पास कहाँ

लम्हे

कमबख़्त  वक़्त के फरिश्ते
बेईमानी पे उतर आते हैं
पलक झपकते ही
कुछ साल गुज़र जाते हैं
कुछ रिश्तों के रंग
कुछ अपने खो जाते हैं

कमबख़्त वक़्त के फरिश्ते
बेईमानी पे उतर आते हैं
पलक झपकते ही
कुछ साल याद आते हैं
कुछ मौजुदगिया तो दरकार हैं
कुछ लम्हे कह जाते हैं

कहानी

ये तो खेल हैं बस सियासतगरों का
नहीं जोधा या पद्मावती की कहानी
जो दिखा रहे हैं सीना तान के दिलेरी
उनकी तो आदत हैं तख़्त की दलाली

चलो मान भी लो हैं सारे इलज़ाम सही
जिनपे हैं ऊँगली उठी वह हैं मुजरिम भी
मगर धमका के एक नारी को रखी लाज हमारी
क्या ये गर्व से कहेगी हमारी रानी?

India has had a complex history with multiple versions of the same events. Any intentional efforts to malign respected figures who sacrificed in the making of our nation should be discouraged – I support that. But no one has to live in the fear of their life if ever there is such an act in question. #Padmavati