हस्ती

वक़्त को यूँ ठहराया ना करो
चाँद को यूँ जलाया ना करो
मक़सद हमारे यूँ बदलाया ना करो
आदत तुम्हारी यूँ लगाया ना करो

बेजार दिल ने की शिकायत खुदा से
क्यों तराशा तेरे चेहरे को इतने इत्मिनान से
बोला इसलिए समाया तुझमे कायनात को
ताकि मेरी हस्ती पे शक तुम किया ना करो

हकीक़त

मेरे धड़कनों की दस्तकों से
गूँजी थी तेरी इजाजत
सपनों में हो शामिल तेरे
जिंदगी हो गयी थी नुमायत

अब तो बस यही हैं
उस जिंदगी से ये शिकायत
फीके हुए ख्वाबों जैसी
हो गयी हैं हमारी हकीक़त

गांठ

एक पतंग की डोर सी
थी सीधी साधी जिंदगी
आकर पवन के झांसे में
कुछ गुमराह सी हो गई
जोश में उड़ान जो भरी
कुछ गांठे ये सख्त हो गई

अकेलापन

रोक ना सका कोई
इन आँसूओ का सावन
ना दिखाओ ख्वाब जो
होंगे ना पूरे किसी आंगन
काफी ना होगी चाहत तुम्हारी
जो तोड़े इन बेड़ियों का बंधन
माँग के दिल मेरा मुझसे
ना छीनो मेरा अकेलापन

बिस्मिल

चंद अल्फ़ाज़ उतर ना पाए जुबान पर
खामोश रह गयी तेरी बिदाई
अब किश्तों में मचाएंगे शोर जिंदगी भर
ये बिस्मिल दिल और तन्हाई

दस्तक

कुछ दोस्तों ने मिलके
दुश्मनों को दस्तखत दे दी
कुछ अपनों ने ही अपनी
सारी मिट्टी निलाम कर दी
कल शायद सूरज भी
सेहर में सहम जाएगा
कोई एक अजनबी जब
बंदूक से दस्तक देगा

On Afghanistan, August, 2021

अजनबी

समशान घाट की चीखों से दूर
सर पे हाथ रखे था कोई बैठा
“जानपहचान का था या था कोई सगा?”
कर हिम्मत मैंने उसे पूछा
“ना कोई मेरा सगा ना कोई पराया,
पर इंसान, आज तो मैं भी थक गया”
कहकर यमराज अकेले ही रो दिया

#covid19

थोड़ा जी लेने दे

आज तूफान को हँस लेने दे
अंधेरे को तू छा जाने दे
थोड़ा खून बह लेने दे
दिल पे घाव लग जाने दे

थोड़ा बोझ समंदर को भी लेने दे
इस कश्ती को डूब जाने दे
बादल को थोड़ा पिघल लेने दे
बरसात से आंसू धूल जाने दे

आंधी को भी थक जाने दे
धड़कन दिल की सुन लेने दे
तक़दीर को भी जरा हैरान होने दे
अपने आप को थोड़ा मुस्करा लेने दे

जीजान

लो फिर से हो गए खड़े चौराहें पे
चाहनेवालों को देने फूल के ठेले

अब कुछ मजनू और कुछ लैला खरीदेंगे
अपने इश्क़ का सबूत थोड़े थोड़े सिक्कों में

अरे इस गुल को तो बक्श दिया होता
तुम्हारे चंद रोज के बुखार में कुर्बान ना होता

अगर हैं शौंख मोहब्बत सरहाने का तो सुनो
एक भवरा ढूंढ रहां हैं खोये हुए जीजान को

क्या खोया, क्या पाया?

ये बेक़रार तेरी आहट में
इत्मीनान पाता हैं
ये मोहताज तेरे साये में
पनाह पाता हैं
ये मुसाफिर तेरी जुस्तजू में
मंजिल पाता हैं
ये कंजर तेरी निगाहों में
जहाँ पाता हैं
तू नहीं यहाँ मगर
तेरी जुदाई सहकर
ये काफिर तेरी हस्ती में
खुदाई पाता हैं