समशान घाट की चीखों से दूर
सर पे हाथ रखे था कोई बैठा
“जानपहचान का था या था कोई सगा?”
कर हिम्मत मैंने उसे पूछा
“ना कोई मेरा सगा ना कोई पराया,
पर इंसान, आज तो मैं भी थक गया”
कहकर यमराज अकेले ही रो दिया
#covid19
Poems by Rohit Malekar
समशान घाट की चीखों से दूर
सर पे हाथ रखे था कोई बैठा
“जानपहचान का था या था कोई सगा?”
कर हिम्मत मैंने उसे पूछा
“ना कोई मेरा सगा ना कोई पराया,
पर इंसान, आज तो मैं भी थक गया”
कहकर यमराज अकेले ही रो दिया
#covid19
आज तूफान को हँस लेने दे
अंधेरे को तू छा जाने दे
थोड़ा खून बह लेने दे
दिल पे घाव लग जाने दे
थोड़ा बोझ समंदर को भी लेने दे
इस कश्ती को डूब जाने दे
बादल को थोड़ा पिघल लेने दे
बरसात से आंसू धूल जाने दे
आंधी को भी थक जाने दे
धड़कन दिल की सुन लेने दे
तक़दीर को भी जरा हैरान होने दे
अपने आप को थोड़ा मुस्करा लेने दे
लो फिर से हो गए खड़े चौराहें पे
चाहनेवालों को देने फूल के ठेले
अब कुछ मजनू और कुछ लैला खरीदेंगे
अपने इश्क़ का सबूत थोड़े थोड़े सिक्कों में
अरे इस गुल को तो बक्श दिया होता
तुम्हारे चंद रोज के बुखार में कुर्बान ना होता
अगर हैं शौंख मोहब्बत सरहाने का तो सुनो
एक भवरा ढूंढ रहां हैं खोये हुए जीजान को
ये बेक़रार तेरी आहट में
इत्मीनान पाता हैं
ये मोहताज तेरे साये में
पनाह पाता हैं
ये मुसाफिर तेरी जुस्तजू में
मंजिल पाता हैं
ये कंजर तेरी निगाहों में
जहाँ पाता हैं
तू नहीं यहाँ मगर
तेरी जुदाई सहकर
ये काफिर तेरी हस्ती में
खुदाई पाता हैं
क्यों ये दिल रखता हैं कोई ख्वाइश
जब रिश्तों ने ही की सिर्फ नुमाइश
फिर कोई गैर क्यों सुने तेरी गुजारिश
काश कोई आइना बनाता तस्वीर ऐसी
खुद को थोड़ा ढूंढ लेता मैं इस डगर
अक्स में होते रंग जज्बातों के अगर
दिख जाते फिर एक साथ हिरसात
बंद किले में मेरे सारे एहसासत
साथ लिए जानी पहचानी अजनबियत
जिंदगी जूनून ना बन जाए
हसरत चाहत न बन जाए
अपने लटों को उँगलियों से ना छेड़िये
अपनी निगाहों से हमें कैद ना कीजिये
ये पल पूरी जिंदगी ना बन जाए
आप हमारी कायनात ना बन जाए
पूंछती हैं राहें तुझे ए हमसफर
तेरी मंज़िल कब होगी करीब
जब तूफान को हराकर
चिड़िया को होगी तबस्सुम नसीब
तब सुला देंगे ये बेख्वाब रात
कह गया कोई एक गरीब
पूंछती हैं राहें तुझे ए हमसफर
कब तक लड़ेगा तू बिना सहारे
भूख को कर दफ़न अरसा हो गया
मातम में हम अकेले ही रो लिए
छोड़ रंजिश अभी उम्मीद कायम हैं
इस बरसात ने आँसू जो पोंछ दिए
Tens of thousands of impoverished migrant workers have been forced to leave cities and towns where they had toiled for years building homes and roads after they were abandoned by their employers — casualties of a nationwide lockdown in India to stop the virus from spreading (2020).
जितने ऊंचे
हंसी के फवारे
उससे गहरे
ग़म के साये
डूबते हुए अनेक
दुविधा के भवंडर में
शिकायत कर रही
अधूरी ख्वाहिशें
“कुछ और ब्याज
बाकी है”, भी कह रहे
ताकते हुए अतीत से
अनदेखे घाव मेरे
जैसे कई अजनबी
एक डूबती नाव में
हम सारे कैदी फंसे
इस एक जिस्म में
डरी हुई सहमी सी
अँधेरे एक कोने में
अकेले ही जूझ रही
तूफ़ान से टकराती
जैसे फहराती मोमबत्ती
“तुम्हे खोने का हैं डर नहीं
मुझे ना होने का ग़म नहीं
वादा करो छोड़ ना देना
तुम सपने देखना कहीं”
कह गई एक ख्वाइश मेरी
इन्सान आज फिर
तू क्यों हैं खोया?
हर वह मकाम
जो तूने ना पाया
उस हर कदम पे
तू जोश से रोया
हर उस मंजिल को
जिसने तुझे अपनाया
छोड़ काफिर उसे
दौड़ा तेरा साया
तेरी आदतें देख
तेरा ख़ुदा भी सहमाया
गर्जे तेरी सुन पंहुचा
अपनी वजूद की इन्तेहाँ
इन्सान आज फिर
तू क्यों हैं खोया?