शुक्र है कि सिर्फ़ चाहने से
दोबारा जी पाता हूँ उन यादों में,
वरना ना जाने कितनी तस्वीरों में
उलझा देता ये आवारा दिल।
शुक्र है कि सिर्फ़ चाहने से
नहीं बनती किसी की क़िस्मत,
वरना ना जाने कितनी तक़दीरों में
उलझा देता ये आवारा दिल।
Poems by Rohit Malekar
शुक्र है कि सिर्फ़ चाहने से
दोबारा जी पाता हूँ उन यादों में,
वरना ना जाने कितनी तस्वीरों में
उलझा देता ये आवारा दिल।
शुक्र है कि सिर्फ़ चाहने से
नहीं बनती किसी की क़िस्मत,
वरना ना जाने कितनी तक़दीरों में
उलझा देता ये आवारा दिल।
ये कोहरा तो पिघल जाएगा,
आफताब की आहट से,
कमबख्त के साथ लिखे,
जो रातभर हमने शिकवे,
दर्द कुछ स्याही में लिपटे,
क्या होंगे कभी वो भी फीके?
अनकहे अल्फाजों की भीड़ में
खिल रहीं ख्वाहिशें
समेटकर मानो पूरी जिंदगी
यूंही एक पल में
इन सांसों की मौजूदगी होगी
तब्दील जब यादों में
कोशिश करेंगे ना होगा गम कोई
आपकी कशिश में
करके मगर तकाजा इजहार का
इस मुलाकात की
ना छीन लो मिल्कियत इकलौती
हमसे हमारी खामोशी
अपने ग़रज़ के लिए नहीं
अपने वजूद के लिए नहीं
अपने सपनों के लिए नहीं
अपने अपनो के लिए नहीं
समेट ले ये पल जरा
बस यूँ ही, बेवजह ज़रा
जैसे एक बादल आवारा
तू उतार दे ये बोझ सारा
ढूंढ ले वो डगर जहाँ
किसी को तेरा इंतजार नहीं
पकड़ वो रास्ता जहाँ
मंज़िल की तुझे दरकार नहीं
तू बुझा दे आज सारे दिये
तू मिटा दे आईने में क़ैद शबीह
तू सजा दे अपने लिए
मनचाही एक परछाई नई
अंग्रेज कर गए बटवारा
अब अमरीकी पुकारे भाईचारा
निकलेगी जब अगली गोली
होगा छल्ली छल्ली
फिर एक बेकसूर सीना
देना जरूर तुम तसल्ली
कहकर कि बस
सीज़फायर तक ही तो हैं रोना
एहसान मनाएगी तुम्हारा
गम में डूबी हर ममता
ऐसा नहीं है कि अब
नहीं लगती बारिश सुहानी
कोयल को सुनकर आज भी
गुनगुना लेता हूँ मैं भी धुन वही
ऐसा नहीं है कि अब
सपनों की हैं कोई कमी
अपनी कमियों को आज भी
कामयाबी में बदलने का है यकीन
ऐसा नहीं है कि अब
रुकी हुईं है जिंदगी कही
अगर बंद कर लूं मुठ्ठी आज भी
हौसला है वक्त को काबू कर लूं वही
मगर अफसोस है ये अब
आदत आपकी हमें कुछ ऐसी थी
की जब से हुईं परे दिल से वो मौजूदगी
जाहिल ढूंढता रहता है वजह मुस्कुराने की
ये शाम ढल क्यों नहीं रहीं?
ये पहेली सुलझ क्यों नहीं रहीं?
आसमान में तारे तो हैं
पर रौशनी अधूरी सी क्यों?
हवा में खुशबू तो है
पर महक से वो परे क्यों?
ये धड़कन कुछ रुकी सी हैं क्यों?
ये जिंदगी कुछ गुत्थी सी हैं क्यों?
मोहब्बत में कुर्बानी की दास्तान
किसी मजनू से मत पूछना
तुम पूछना उस बादल से
जिसने काटी अनगिनत दूरियाँ
सहकर जाने कितनी आँधियाँ
सिर्फ इस एक उम्मीद में
की जब एक दिन मुलाकात होगी
तब कोई बरसात नहीं रुकेगी
वह अपनी मोहब्बत में घुल जाएगा
इस धरती के हर ज़र्रे में बिखरकर
अपना सारा वजूद मिटाकर
कितनी आसान होती जिंदगी अगर
हर मुश्किल मोड पे कोई आकर
थोड़ा सा इस दिल में झांककर
दे देता बस एक P.R. लिखकर
और मैं बदल जाता तब हसकर
बिना conflict के merge होकर
इन निगाहों को इस नकाब से
रिहा ना कीजिएगा
आपके आंसू इस जमाने से
जाहिर ना कीजिएगा
अगर हर आशिक आपका इस गम को
पीने में लग जाएगा
खत्म हो कर शराब हर मयखाने को
फिर ताला लग जाएगा