Ask no kid ever
“Who do you want to
Grow up to be like?”
Since no sapling ever
Wished onto itself
Every leaf and every branch
In the exact shape like
The tallest tree on the pike
Author: Rohit Malekar
मजदूर
पूंछती हैं राहें तुझे ए हमसफर
तेरी मंज़िल कब होगी करीब
जब तूफान को हराकर
चिड़िया को होगी तबस्सुम नसीब
तब सुला देंगे ये बेख्वाब रात
कह गया कोई एक गरीब
पूंछती हैं राहें तुझे ए हमसफर
कब तक लड़ेगा तू बिना सहारे
भूख को कर दफ़न अरसा हो गया
मातम में हम अकेले ही रो लिए
छोड़ रंजिश अभी उम्मीद कायम हैं
इस बरसात ने आँसू जो पोंछ दिए
Tens of thousands of impoverished migrant workers have been forced to leave cities and towns where they had toiled for years building homes and roads after they were abandoned by their employers — casualties of a nationwide lockdown in India to stop the virus from spreading (2020).
आयुष्यात आणखी काय हवंय?
एका हातात भाजलेलं कणीस
दुसऱ्या हातात गरम भजी
वरती ढगांची चादर
खाली पाय पसरायला रिकामा डोंगर
विचारांचा कालवा विरघळायला लागतो
तेवढाच हवेत गारवा
मातीचा सुगंध येईल तितका
पण छत्री लागणार नाही इतका पाऊस
अशा संध्याकाळी कविता करायची सवय
बस, आयुष्यात आणखी काय हवंय?
The Anomalies
Straight lines
Not so straight shadows
Many thoughts
Not so many actions
Determined choices
Not so deterministic results
Fleeting love
Not so fleeting memories
Simple breaths
Not so simple life
कैदी
जितने ऊंचे
हंसी के फवारे
उससे गहरे
ग़म के साये
डूबते हुए अनेक
दुविधा के भवंडर में
शिकायत कर रही
अधूरी ख्वाहिशें
“कुछ और ब्याज
बाकी है”, भी कह रहे
ताकते हुए अतीत से
अनदेखे घाव मेरे
जैसे कई अजनबी
एक डूबती नाव में
हम सारे कैदी फंसे
इस एक जिस्म में
ख़्वाहिश
डरी हुई सहमी सी
अँधेरे एक कोने में
अकेले ही जूझ रही
तूफ़ान से टकराती
जैसे फहराती मोमबत्ती
“तुम्हे खोने का हैं डर नहीं
मुझे ना होने का ग़म नहीं
वादा करो छोड़ ना देना
तुम सपने देखना कहीं”
कह गई एक ख्वाइश मेरी
इन्तेहाँ
इन्सान आज फिर
तू क्यों हैं खोया?
हर वह मकाम
जो तूने ना पाया
उस हर कदम पे
तू जोश से रोया
हर उस मंजिल को
जिसने तुझे अपनाया
छोड़ काफिर उसे
दौड़ा तेरा साया
तेरी आदतें देख
तेरा ख़ुदा भी सहमाया
गर्जे तेरी सुन पंहुचा
अपनी वजूद की इन्तेहाँ
इन्सान आज फिर
तू क्यों हैं खोया?
Petrichor
Some memories that got lost
Some faces that stood faded
Like from the melting frost
Rises a seedling unaided
Doesn’t it all come back again,
With the smell of the first rain?
Petrichor (/ˈpɛtrɪkɔːr/) is the earthy scent produced when rain falls on dry soil.
बेनाम
कुछ मंजिलो के रास्ते नहीं होते
उन मुसाफ़िरों के काफिले नहीं होते
कुछ जज्बातों के अल्फ़ाज़ नहीं होते
उन खामोशियों में हमसफर नहीं होते
कुछ दुआओं की वजह नहीं होती
उन चाहतो में खुदगर्जी नहीं होती
कुछ ख्वाइशें अंजाम नहीं होती
उन यादों में कड़वाहट नहीं होती
कुछ पल इत्मिनान नहीं होते
उन मौजुदगियों में पराये नहीं होते
कुछ इकरार बयान नहीं होते
उन रिश्तों के नाम नहीं होते
Dear Yosemite
I left behind a little bit
of me with you
When my sight took a flight
from the crown of your peaks
When the time stood still
on misty meadows tranquil
When the many sunsets
sparkled across the valley
When the wild wind whirled
with it, every waterfall swirled
When I sat down beside
the river in awe of a dome
When the trail I embraced
refused to return home
And so when you I adore,
like the growing morning dew
I leave behind a little bit more
of me with you.