One with the divine

Can an eye ever see itself? Can a leg ever kick itself? Ever seen a hand that grabs itself, or perhaps, a tooth that takes a bite at itself? If you are “it” then you cannot exist out of what you are.

So tell me how can you be defined…by the thoughts alone that ring in your mind? For surely you have at least once or more…heard a voice within that observed your own.

When in fits of anger, it appealed to you for calm. When driven by hate, it spoke to you of charm. When in depths of jealousy, it reminded you to be grateful. When embroiled in revenge, it rid you from being spiteful.

On days mundane, we let our senses observe the drama around. On better days, we observe the senses for every sound. But what happens when the observer and the observed are sitting on the same mound?*

In that moment when we watch our own self, we see choices beyond the daily grind. In that moment of being present, we are a bit more than our mind. In that moment of self-awareness, we are one with the divine.**


* दृग दृश्य विवेक (Drig Drishya Vivek): Advaita Vedanta text on inquiry into the distinction (vivek) between the “seer” (drig) and the “seen” (drishya), making a case for divinity in all of us by establishing our ability to observe our mind as if watching a third person.

** तत्त्वमसि (Thou art that): One of the four Mahavakyas or great sayings of the Upanishads, it express the insight that the individual self which appears as a separate existence, is in essence part and manifestation of the whole.

Don’t

Don’t believe every thought
Don’t act on every emotion

Don’t opine in every debate
Don’t react to every instigation

Don’t chase every desire
Don’t succumb to every fear

Don’t rave every win
Don’t agonize every loss

Don’t yearn for every memory
Don’t fantasize every dream

You may think you are
The doer in every act

You may sense the world
As another separate fact

Don’t.

मजदूर

पूंछती हैं राहें तुझे ए हमसफर
तेरी मंज़िल कब होगी करीब

जब तूफान को हराकर
चिड़िया को होगी तबस्सुम नसीब
तब सुला देंगे ये बेख्वाब रात
कह गया कोई एक गरीब

पूंछती हैं राहें तुझे ए हमसफर
कब तक लड़ेगा तू बिना सहारे

भूख को कर दफ़न अरसा हो गया
मातम में हम अकेले ही रो लिए
छोड़ रंजिश अभी उम्मीद कायम हैं
इस बरसात ने आँसू जो पोंछ दिए

Tens of thousands of impoverished migrant workers have been forced to leave cities and towns where they had toiled for years building homes and roads after they were abandoned by their employers — casualties of a nationwide lockdown in India to stop the virus from spreading.

आयुष्यात आणखी काय हवंय?

एका हातात भाजलेलं कणीस
दुसऱ्या हातात गरम भजी
वरती ढगांची चादर
खाली पाय पसरायला रिकामा डोंगर
विचारांचा कालवा विरघळायला लागतो
तेवढाच हवेत गारवा
मातीचा सुगंध येईल तितका
पण छत्री लागणार नाही इतका पाऊस
अशा संध्याकाळी कविता करायची सवय
बस, आयुष्यात आणखी काय हवंय?

कैदी 

जितने ऊंचे
हंसी के फवारे
उससे गहरे
ग़म के साये

डूबते हुए अनेक
दुविधा के भवंडर में
शिकायत कर रही
अधूरी ख्वाहिशें

“कुछ और ब्याज
बाकी है”, भी कह रहे
ताकते हुए अतीत से
अनदेखे घाव मेरे

जैसे कई अजनबी
एक डूबती नाव में
हम सारे कैदी फंसे
इस एक जिस्म में

ख़्वाहिश

डरी हुई सहमी सी
अँधेरे एक कोने में
अकेले ही जूझ रही
तूफ़ान से टकराती
जैसे फहराती मोमबत्ती

“तुम्हे खोने का हैं डर नहीं
मुझे ना होने का ग़म नहीं
वादा करो छोड़ ना देना
तुम सपने देखना कहीं”
कह गई एक ख्वाइश मेरी

इन्तेहाँ

इन्सान आज फिर
तू क्यों हैं खोया?

हर वह मकाम
जो तूने ना पाया
उस हर कदम पे
तू जोश से रोया

हर उस मंजिल को
जिसने तुझे अपनाया
छोड़ काफिर उसे
दौड़ा तेरा साया

तेरी आदतें देख
तेरा ख़ुदा भी सहमाया
गर्जे तेरी सुन पंहुचा
अपनी वजूद की इन्तेहाँ

इन्सान आज फिर
तू क्यों हैं खोया?

बेनाम

कुछ मंजिलो के रास्ते नहीं  होते
उन मुसाफ़िरों के काफिले नहीं होते
कुछ जज्बातों के अल्फ़ाज़ नहीं होते
उन खामोशियों में हमसफर नहीं होते

कुछ दुआओं की वजह नहीं होती
उन चाहतो में खुदगर्जी नहीं होती
कुछ ख्वाइशें अंजाम नहीं होती
उन यादों में कड़वाहट नहीं होती

कुछ पल इत्मिनान नहीं होते
उन मौजुदगियों में पराये नहीं होते
कुछ इकरार बयान नहीं होते
उन रिश्तों के नाम नहीं होते