गम

इन निगाहों को इस नकाब से

रिहा ना कीजिएगा

आपके आंसू इस जमाने से

जाहिर ना कीजिएगा

अगर हर आशिक आपका इस गम को

पीने में लग जाएगा

खत्म हो कर शराब हर मयखाने को

फिर ताला लग जाएगा

देणं

सावली बि गिळून

सांज गेली ढळून

तिच्या संगं जळून

आणि यक सपान

इस्कटल्यालं नशीब

उतरवलं थोडं ऋण

मागच्या येका जन्माचं

असंल राहिलेलं देणं

शिंपल्या

कुठे सरले दिस
जीव होतो कासावीस
भरून आलं उरात
मोठी एक शंका मनात
आहेस तु खरंच आठवण
की अर्धवट एक खोटं स्वप्न

माझ्या आयुष्याच्या गलबल्यात
टिकल्या नाहीत तुझ्या कविता
उगाच नाही काठावर आता
कुठेच मिळत जोड्या
विखुरल्यात सर्वत्र फक्त
तुटलेल्या एक एक शिंपल्या

The Dandelion Seed

Like a dandelion seed,
that lands on a palm,
I found the muscle,
With the wind to wrestle.

“I am done being swayed,
And pushed and shoved,
I am taking a stand,
to break your command.”

Your palms made a nest,
For a tiny moment’s rest,
For yet another flight,
To take on the wind’s might.

And I heard while I lay,
Your eyes whisper and say,
The words shared by few,
“I see you.”

‘Twas that moment,
That freed all lament,
I knew before I again flew,
I had found me through you.

अंजान

कलम से कुछ लब्ज़
जुदा ना हो पाएं
दिल से कुछ ख्वाइशें
अलविदा ना हो पाएं

चाहें आप हमसे कभी
मेहरबान ना हो पाएं
इन नज्मों से आप कभी
अंजान ना हो पाएं

कबर

बिक रही हैं ज़िंदगियाँ
पत्थरों के दाम
क्या खोज रहाँ इन्सान
खुद ही से हैं वो बेईमान

तान कर खड़े हैं सीने
बिना किसी खबर
खोद ली हैं हमने
कब से अपनी ही कबर

मौजूदगी

लब्ज़ कही कागज पे
आज उतर ना जाए

जज़्बात कही निगाहों से
जाहिर ना हो जाए

ख्वाइशें कही सीने से
परे ना हो जाए

आपको क्या खबर
आपकी मौजूदगी का असर

मेरी धड़कनों से कही इश्क मेरा
बयान ना हो जाए

गोष्ट

हिरव्यागार खोऱ्यात
जसं गवताचं पातं
तुझी आठवण
रमली माझ्या मनात

तुझी संगत 
साधायचं जसं वेडं 
तसच व्याकूळ
होतं आजही थोडं 

सांगायचं म्हटलं
तर गोष्ट साधीच
शेवटची पानं
बरी आहेत अर्धीच