महत्त्वाकांक्षा

असंच एकदा कधीतरी

भर उन्हात दुपारी

रिकाम्याश्या रस्त्यालगत

बंद दुकानाच्या फळीवर

हाताची उशी करून

पाय जरा मोकळं पसरून

तास दोन तास तरी

मस्त ताणून देण्याची

महत्त्वाकांक्षा उरात

बाळगून आहे जोरात

The Shape of Your Universe

When you hiked not to get to the top
But to discover how the trail bends
Ever wrote down a thought without
Knowing how it all ends.

When your biases came pounding
You bent for only a few
Ever changed your mind about
Something important to you.

When you moved across oceans
To mend a broken heart
Embraced your guilt and forgave
Your younger self’s part.

When in spite of a heart full of rage,
You unclenched that fist a little,
You changed the shape of your universe,
You made it a bit less brittle.

आठवण

अधून मधून पावसात
जाणवते एक कमजोरी
तुझ्या सोबत घेतलेल्या
काही श्र्वासांची शिदोरी
आणि व्यक्त ना केलेल्या
काही भावनांची साठवण
घेऊन कोसळते सर जेव्हा
अश्रुत चिंब तुझी आठवण

कोहरा

ये कोहरा तो पिघल जाएगा,
आफताब की आहट से,
कमबख्त के साथ लिखे,
जो रातभर हमने शिकवे,
दर्द कुछ स्याही में लिपटे,
क्या होंगे कभी वो भी फीके?

राजगडाची रात्र

किती डोळ्यात वाट
आता झाली पहाट
आला पहिला प्रहर
देवा, का हा कहर?

तो औरंग्या शापित
त्याचा मुठीत काबीज
झाला अर्धा मुलुख
काय करल तो सुलुख?

रोवलंय माझ्या लेकरानं
स्वराज्यचं अनमोल बीज
तोवर नाही त्याला निज
त्याची तुला काय चीज?

नको चांदणं अंगणात
माझ्या छाव्यास ते दाव
त्याचं पाऊल जंगलात
तोवर तू पाण्यात

Jijamata endured a long and harrowing silence, with weeks of rumours whispering Shivaji’s recapture or worse, his death, as he travelled in disguise through hostile Mughal territory after his daring escape from Agra. This is an attempt to pen a sleepless night for a deeply devout parent who had already endured the loss of one son.

खामोशी

अनकहे अल्फाजों की भीड़ में
खिल रहीं ख्वाहिशें
समेटकर मानो पूरी जिंदगी
यूंही एक पल में


इन सांसों की मौजूदगी होगी
तब्दील जब यादों में
कोशिश करेंगे ना होगा गम कोई
आपकी कशिश में


करके मगर तकाजा इजहार का
इस मुलाकात की
ना छीन लो मिल्कियत इकलौती
हमसे हमारी खामोशी

परछाई

अपने ग़रज़ के लिए नहीं
अपने वजूद के लिए नहीं
अपने सपनों के लिए नहीं
अपने अपनो के लिए नहीं

समेट ले ये पल जरा
बस यूँ ही, बेवजह ज़रा
जैसे एक बादल आवारा
तू उतार दे ये बोझ सारा

ढूंढ ले वो डगर जहाँ
किसी को तेरा इंतजार नहीं
पकड़ वो रास्ता जहाँ
मंज़िल की तुझे दरकार नहीं

तू बुझा दे आज सारे दिये
तू मिटा दे आईने में क़ैद शबीह
तू सजा दे अपने लिए
मनचाही एक परछाई नई

सीज़फायर

अंग्रेज कर गए बटवारा
अब अमरीकी पुकारे भाईचारा
निकलेगी जब अगली गोली
होगा छल्ली छल्ली
फिर एक बेकसूर सीना
देना जरूर तुम तसल्ली
कहकर कि बस
सीज़फायर तक ही तो हैं रोना
एहसान मनाएगी तुम्हारा
गम में डूबी हर ममता